January 14, 2018


          There was a spiritual seeker, apprentice under a himalayan guru. He was so obsessed with his own spiritual upliftment, that he abhorred the various tasks assigned to him by his guru. He considered doing daily chores of ashram  like cooking, cleaning etc.,  to be waste of his precious time.So, he  decided to leave the ashram to focus single-mindedly on his spiritual upliftment.

        He visited his guru  12 years later, to showcase the mystic power he had learnt. His guru asked him what did he learn in 12 years. He announced boastfully-" I can produce fire from my mouth."Saying thus, he opened his mouth and spewed flames of fire, just like the mystic dragon.

          His guru remarked-"Even a simple match-stick can produce fire. You have wasted 12 years of  your life  to learn producing fire from your mouth, which can be done by a  match-stick."

           So,the moral of the story is that we need to pause from time to time to review our obsession with fluency. It is very natural for a PWS to be obsessed with fluency. But fluency in speech  is a part of communication skills, not the alpha and omega of it.In today's world , communication skills include written communication(social media like FB, whatsapp,twitter.,official  emails, formal written letters etc..), body language etc. , along with speech. So , working on communication skills in a holistic manner, and investing our time in learning important  life skills (which can be different for different people, to each his/her own) would be far better approach towards living life. 

November 6, 2017

Accept "It"

While  watching  any portrayal of  pws  in movies , tv shows  or in advertisements, I always got the feeling that someone is trying to get under my skin. I thought that I have to confront others about my stuttering and I was uncomfortable with others. Many recent films and tv shows have shown pws in authentic ways be it Oscar winning movie " The king’s speech" or "Nescafe advertisement". Both have shown that a stutterer can achieve his goals regardless of the stigma attached to it. But have it done any good to me. Of course that had raised some awareness in normal people, but still why I feel shame and guilt about my condition. Despite reading articles on concept of acceptance and by applying also it in real life circumstances, why I am not comfortable in seeing a person stammering on screen. Finally “It” happened.
Recently I went to watch the acclaimed Hollywood horror movie “It” with my colleague. It had its protagonist stuttering. I thought here we go again. I had expected a few laughs or getting an empathetic response from my fellow audience members. Halfway  through the movie no one laughed or felt sad for our hero instead he was the one who was leading the fight against the eponymous monster .While audience were engrossed in watching the movie my colleague said to me hey that kid is brave dude. That’s when it hit me. The audiences were seeing the stammering as other personality traits of the character, but it was me who was getting uncomfortable. May be in real life also people view our stammering as just another attribute that we possess. All the way along it was me who was being self conscious.
I realized that I identified myself as a stutterer  first  and also in real life talking situations before speaking I still sometimes think of what I am going to say, so I can run away from any further embarrassment. But to other people I am still the real me who is yet to be discovered by myself.
P.S :[NOT MY WORDS] World was never interested in our stammering. It is we ourselves who had made it into an outsized super-important aspect of our lives. And then, continued to blame the world and believe that: I will be OK only when the world has changed. 
But the fact is - WORLD is only our own reflection in the mirror.

October 10, 2017

NC 2017 : जहां हकलाने पर मिलती हैं तालियां

एक हॉल में 80 लोग बैठे हुए हैं। 15 साल का एक किशोर मंच पर आकर माईक थामकर अपना नाम बताने की कोशिश करता हुआ… ह-ह-ह… लेकिन अटक जाता है, एक बार फिर प्रयास करता है ह-ह-ह- हरमन सिंह। सामने बैठे हुए लोग हरमन के हकलाने पर तालियां बजाकर उसका स्वागत करते हैं। आमतौर पर हकलाने वाले व्यक्ति को किसी भी जगह बोलने में संकोच और डर का सामना करना पड़ता है, लेकिन यह एक ऐसा अवसर था जहां सभी को खुलकर हकलाने की पूरी आजादी थी।
भारत में पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी, केन्द्रशासित प्रदेश, प्राकृतिक सुन्दरता और आधुनिकता के लिए मशहूर शहर चण्डीगढ़ में द इण्डियन स्टैमरिंग एसोसिएशन (तीसा) का सातवां राष्ट्रीय सम्मेलन 30 सितम्बर से 2 अक्टूबर 2017 तक सेक्टर 24 स्थित इंदिरा हॉलिडे होम में सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में आंध्रप्रदेश, गोवा, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर और उत्तराखण्ड राज्य के 80 हकलाने वाले व्यक्तियों ने सहभागिता की।
पहला दिन- हकलाओ मगर खुलकर…
राष्ट्रीय  सम्मेलन की शुरूआत तो एक दिन पहले 29 सितम्बर को हो गई थी। 12 प्रतिभागी एक दिन पहले से इंदिरा हॉलिडे होम पंहुच चुके थे। 30 सितम्बर की सुबह से ही लोगों के आने का सिलसिला शुरू हो गया। पहले दिन सुबह 9 बजे नाश्ता और चाय परोसा गया। प्रतिभागियों ने नाश्ता के दौरान ही एक-दूसरे का अभिवादन और परिचय प्राप्त किया। वहीं पुराने साथी आपस में मिलकर बहुश खुश हुए।
सम्मेलन हॉल में 10 बजे से पंजीयन प्रारंभ हो गया। लोग बारी-बारी से अपना पंजीयन करवा रहे थे। सभी के ठहरने, जलपान और भोजन की व्यवस्था इंदिरा हॉलिडे होम पर ही की गई थी। यह स्थान चण्डीगढ़ शहर के मध्य स्थित है। परिसर की प्राकृतिक सुंदरता सभी का मन मोह रही थी।
तीसा का यह सातवां वार्षिक सम्मेलन था। कार्यक्रम के कुछ सामान्य नियम थे- खुलकर हकलाना, किसी को हकलाने पर टोकना नहीं, बिना मांगे किसी को सलाह नहीं देना और बोलते समय अपनी समय सीमा का ध्यान रखना।
सम्मेलन की औपचारिक शुरूआत परिचय से हुई। सभी प्रतिभागियों ने मंच पर आकर अपना परिचय दिया- वह भी खूब हकलाकर। यह एक ऐसा मंच था जहां पर लोगों को खुलकर हकलाने की पूरी आजादी थी, कोई रोक-टोक नहीं, कोई बंधन नहीं। जैसा चाहें वैसा हकलाएं…
सम्मेलन का आयोजन चण्डीगढ़ स्वयं सहायता समूह के करकमलों से आयोजित किया गया। आयोजक टीम में जसवीर सिंह, नितिन गौतम, जसवीर सिंह और आलोक प्रताप सिंह शामिल रहे। सम्मेलन में स्वागत भाषण जसवीर सिंह ने दिया। उन्होंने सम्मेलन में आने पर सभी का स्वागत करते हुए कहा कि हमें अपने सपनों को पूरा करने के लिए पूरी मेहनत के साथ जुट जाना चाहिए। सपने वे नहीं होते जो हम सोते हुए देखते हैं, बल्कि सपने वे हैं जो हमें सोने नहीं देते। दुनिया में कई ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने हकलाहट के बावजूद अपनी प्रतिभा के दम पर देश और समाज को गौरवांवित किया है। इसलिए लक्ष्य को पाने के लिए समर्पित हो जाएं।
यह राष्ट्रीय सम्मेलन अब तक हुए सभी आयोजनों से कुछ अलग था। इस बार सम्मेलन का कोई पूर्व निर्धारित एजेंडा नहीं था यानी पूरी आजादी थी हकलाने की… तीसा की मूल सोच भी यही रही है कि हकलाने वाले व्यक्ति को तीसा के मंच पर हकलाने के मामले में पूरी आजादी महसूस हो।
“मैं आसानी से अपने शब्दों को बिनी किसी संघर्ष से बोल पा रही हूं।”
प्रथम सत्र में हकलाने वाले साथियों को अपने अनुभव साझा करने के लिए मंच पर आमंत्रित किया गया। कानपुर से आए राहुल कुमार ने कहा- जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ता था तब पहली बार हकलाहट को महसूस किया। मेरे हकलाने पर लोगों का रूख मुझे अंदर से बहुत परेशान कर देता था। स्पीच थैरेपी लिया, कई अभ्यास किया, लेकिन कोई फायदा नहीं मिला। उल्टे मेरा हकलाना बढ़ता ही गया। बचपन में चित्रकारी की ओर भी ध्यान गया, लेकिन प्रोत्साहन के अभाव में यह कला भी हाथ से निकल गई। सौभाग्य से इंटरनेट पर तीसा की खोज की और पहली बार इस मंच पर आकर बहुत सकारात्मक महसूस कर रहा हूं। यह एक ऐसा मंच है जहां हकलाने पर तालियां मिलती हैं।
नई दिल्ली से आई रूचि वर्मा ने बताया- तीसा में शामिल होने से पहले एक शब्द भी नहीं बोल पाती थी। स्वयं सहायता समूह में प्रोलागशिएसन और पाजिंग तकनीक का इस्तेमाल करने पर काफी राहत मिली है। अब मैं आसानी से अपने शब्दों को बिनी किसी संघर्ष से बोल पा रही हूं।
ध्यानेश केकरे (गोवा) ने कहा- हमें अपनी सोच को बड़ा बनाना चाहिए और बड़े बदलाव के लिए कार्य करते रहें। हकलाहट से बाहर निकलकर जिन्दगी के अन्य पहलुओं जैसे- नौकरी, विवाह, रिश्ते-नाते, सामाजिक मेलमिलाप आदि क्षेत्रों पर अब अपना ध्यान देने की जरूरत है, तभी हम जीवन का सच्च आनंद उठा पाएंगे।
गुजरात से आए सत्यम सिंह ने कहा- तीसा ने हकलाने वाले लोगों की जिन्दगी में आशा की एक किरण पैदा की है। हकलाहट को कई सालों से छिपाने वाले, हकलाहट से डरने वाले साथी अब हकलाहट का आनंद ले रहे हैं। यह सचमुच एक चमत्कार है।
“महिलाएं भी सभी बंधनों से आजाद होकर हकलाहट के बारे में जागरूक हो रही हैं।”
भारत की आर्थिक राजधानी मुम्बई से आई भावना पाटिल ने बताया- तीसा के साथ हकलाने वाली युवतियां/महिलाएं भी जुड़ रही हैं। मुम्बई स्वयं सहायता समूह में कई लड़कियां हैं, जो हर रविवार को बैठक में शामिल होकर हकलाहट पर चर्चा करती है। तीसा से महिलाओं का जुड़ना इस बात की ओर इशारा करता है कि अब महिलाएं भी सभी बंधनों से आजाद होकर हकलाहट के बारे में जागरूक हो रही हैं।
हिमाचल प्रदेश से पधारे शिवशंकर शर्मा ने कहा- हमारे अंदर से हकलाहट का डर जितना अधिक बाहर निकलता जाएगा, उतना ही हम बंधनमुक्त होकर प्रगति कर पाएंगे। मैंने स्वीकार्यता को गहराई से महसूस किया और समाज से जुड़ने के लिए प्रयासरत रहा।
राकेश जायसवाल (उत्तरप्रदेश) ने कहा- एक समय ऐसा था जब मेरे घर के आसपास भी मेरा काई दोस्त नहीं था। आज यह कहने में मुझे बड़ा गर्व महसूस हो रहा है कि तीसा से जुड़ने के बाद भारत के कई राज्यों में मेरे ढेरों दोस्त हैं।
“हकलाने वाले बच्चे भी हर तरह से काम कर सकते हैं।”
सम्मेलन में 15 साल के किशोर हरमन सिंह ने भी भाग लिया। हरमन की माताजी ने कहा- यहां आना एक अद्भुत मौका है। यहां आने पर पता चला कि हकलाने वाले बच्चे भी हर तरह से काम कर सकते हैं।
इस प्रकार लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए। दोपहर 2 बजे लंच प्रारंभ हुआ। दोपहर 3 बजे फिर से सम्मेलन शुरू हुआ। 
इस सत्र में तीसा के 2 वरिष्ठ सदस्यों ने तीसा की स्थापना, दृष्टिकोण और कार्यक्रमों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि तीसा की औपचारिक शुरूआत 2008 में हुई थी और 2011 में तीसा का पहला वार्षिक सम्मेलन भुवनेश्वर (उड़ीसा) में आयोजित हुआ। तीसा मूलतः 3 सिद्धांतों पर कार्य करता है- स्वीकार्यता, स्वैच्छिक सेवा और स्वयं सहायता। हकलाने पर हमें शर्मिंदा नहीं होना चाहिए, क्योंकि हम हकलाने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। तीसा धाराप्रवाह बोलना सिखाने या हकलाहट के इलाज का दावा नहीं करता। वास्तव में धाराप्रवाह बोलने से ज्यादा जरूरी है सामाजिक होना। हमें स्वीकार्यता को महसूस करने की जरूरत है। हमें हकलाहट को खुलकर स्वीकार करना चाहिए, लेकिन खराब संचार को नहीं। इसका मतलब है कि हकलाने वाला व्यक्ति अपने संचार कौशल को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास करता रहे।
तीसा में अपनी रोचक गतिविधियों के लिए मशहूर शैलेन्द्र कुमार विनायक (नई दिल्ली) ने कई गतिविधियां करवाकर प्रतिभागियों को रोमांचित कर दिया। इन गतिविधियों में शामिल होकर प्रतिभागियों ने सफल संचार के विभिन्न पहलुओं के बारे में अपनी समझ विकसित की और अच्छा संचारकर्ता बनने के लिए व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया। इन गतिविधियों की विस्तृत जानकारी के लिए अप्रैल 2017 में नई दिल्ली में आयोजित कार्यशाला की रिपोर्ट पढ़े। लिंक
तीसा के कार्यक्रम में पहली बार शामिल हुए नए सदस्यों के लिए अलग से एक सत्र आयोजित किया गया। इसमें विभिन्न् स्पीच तकनीक का अभ्यास और संचार की बुनियादी बातों से अवगत कराया गया।
वैसे तो पहले दिन सम्मेलन का औपचारिक समापन शाम 6 बजे हो गया था, लेकिन परिसर पर ठहरे हुए प्रतिभागी आगे भी गतिविधियां करने के लिए इच्छुक थे। वहीं कुछ साथी चण्डीगढ़ शहर घूमने के लिए निकल पड़े। एक बार फिर सम्मेलन हॉल में कुछ साथी इकट्ठा हुए और अंताक्षरी, शोरा शायरी, फिल्मी गानों और डांस का सिलसिला रात 9 बजे तक चलता रहा। कुछ प्रतिभागी परिसर में ही अलग-अलग समूहों में एक-दूसरे से चर्चा कर उनके अनुभव जान रहे थे। रात 9 बजे सभी ने भोजन ग्रहण किया। इस तरह सम्मेलन का पहला दिन शानदार रहा।
दूसरा दिन- आजमाएं कुछ नया…
परिसर में ठहरे हुए प्रतिभागी सुबह से ही अपने कमरों से बाहर निकलकर एक-दूसरे से मिल रहे थे। कुछ साथी बाहर सुबह की सैर पर निकल पड़े, तो कुछ अपनी दिनचर्या के अनुसार प्राणायाम, योग और ध्यान कर रहे थे। सुबह 9 बजे सभी ने नाश्ता और चाय लिया। अब तक चण्डीगढ़ के स्थानीय प्रतिभागियों का आना भी शुरू हो गया था। सुबह 10 बजे सम्मेलन का दूसरा दिन प्रारंभ हुआ।
प्रथम सत्र में विपासना ध्यान की गतिविधि आयोजित की गई। चण्डीगढ़ के वरिष्ठ विपासना साधक ने बताया कि विपासना बहुत ही सहज और सरल ध्यान है। इसमें व्यक्ति को आराम से बैठकर केवल अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करना होता है। इस मौके पर विपासना ध्यान पर आधारित एक आडियो सुनाया गया। इसके बाद सभी लोगों ने अपनी आंखें बंद करके 10 मिनट विपासना ध्यान का अभ्यास किया। विपासना का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को मानसिक शांति देना और मन से सबल बनाना है। इससे व्यक्ति के अन्दर सकारात्मक ऊर्जा और विचारों का संचार होता है। आज कई प्रसिद्ध लोग विपासना के नियमित अभ्यासी हैं।
“हकलाहट में ही हमारी सम्पूर्णता है।”
द्वितीय सत्र में एक बार फिर हकलाहट पर चर्चा शुरू हुई। प्रमोद कुमार कथुरिया ने बताया- जीवन के 60 वर्ष तक धाराप्रवाह बोलने की चाह में इधर-उधर भटकता रहा। कई जगह जाकर स्पीच थैरेपी लिया। अंततः तीसा से जुड़ने के बाद महसूस हुआ कि हकलाहट में ही हमारी सम्पूर्णता है। धाराप्रवाह बोलना कतई जरूरी नहीं है।
शिमला से आए अभिषेक कुमार ने बताया कि स्वीकार्यता की अवधारणा ने जीवन में किसी भी चीज को कमी के साथ स्वीकार करने के लिए प्रेरित किया है। अगर मैं हकलाता नहीं होता तो जिन्दगी में बहुत कुछ कर पाता, इस सोच से बाहर निकलकर हमें यह स्वीकारना चाहिए कि हकलाहट के बावजूद भी हम बहुत कुछ कर सकते हैं। पहले मैं किसी से फोन पर बात करने या किसी मीटिंग में जाने से पहले यह तैयारी कर लेता था कि वहां पर क्या बोलना है, किन-किन शब्दों का इस्तेमाल करना है। धीरे-धीरे यह सब प्रयास खत्म हो गए हैं। अब मैं खुलकर हकलाता हूं। कार्यालय में मेरे सहकर्मी मेरी हकलाहट को भी एक सामान्य स्पीच की तरह लेने लगे हैं। अब मेरे हकलाने पर उन्हें कोई परेशानी नहीं होती।
परमानन्द धीमान (देहरादून) ने कहा- हकलाने पर लोग क्या सोचेंगे, इसी चिंता में जीवन में 30 साल बिता दिए। जब मैंने लोगों से हकलाने के बारे में बात की और लोगों के सामने हकलाहट को स्वीकार किया तब मालूम हुआ कि लोगों की प्रतिक्रिया और सोच बहुत ही सकारात्मक है।
“धाराप्रवाह बोलने की अंधी दौड़ से बाहर हो जाएं।”
चण्डीगढ़ में पीएचडी छात्रा ईरम खान ने बताया- हकलाने पर मेरा अनुभव यह रहा है कि लोगों को हमारी हकलाहट से ज्यादा समस्या नहीं है। हम कैसे बोल रहे हैं, यह मायने नहीं रखता। हम क्या बोल रहे हैं, इसमें लोगों की दिलचस्पी ज्यादा रहती है। इसलिए अपने संचार को अच्छा बनाने का प्रयास करना चाहिए। धाराप्रवाह बोलने की अंधी दौड़ से बाहर हो जाएं।
भोपाल से आए जगदीश मेवाड़ा ने एक सुंदर बात कहीं- जब हम भोजन ग्रहण करने में, चलने-फिरने में, देखने में जोर नहीं लगाते है, कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करते हैं, तो फिर बोलने के लिए क्यों जोर लगाते हैं, जल्दीबाजी करते हैं। हमें आराम से बोलना चाहिए। इससे हमारा बोला हुआ दूसरे लोग ठीक तरह से समझ पाएंगे।
इस तरह सभी ने अपने अनुभव साझा किए। दोपहर 2.30 बजे लंच हुआ। लंच के बाद सभी प्रतिभागी दोपहर 3 बजे हॉल में एकत्रित हुए। सभी प्रतिभागियों को एक-एक फोल्डर दिया गया। फोल्डर के अंदर एक प्रश्नावली और कुछ खाली कागज लगे हुए थे। बताया गया कि हम सभी को 4 समूहों में विभाजित होकर शहर के चार सार्वजनिक स्थानों पर जाकर हकलाहट के विषय में अनजान लोगों से बातचीत करनी हैं, उनका साक्षात्कार लेना है। ये चार सार्वजनिक स्थान थे- पंजाब विश्वविद्यालय, सुकमा झील, रॉक गार्डन और रोज गार्डन। सभी प्रतिभागियों ने अपनी पसंद के मुताबिक स्थान का चयन किया और अपने समूह के मुखिया के साथ गंतव्य की ओर रवाना हुए। सभी ने भीड़भाड़ वाले इलाके में अनजान व्यक्तियों से बातचीत की और हकलाहट पर उनके विचारों को जाना-समझा। ये सभी चारों स्थान सुंदर  और मनोहारी हैं। प्रतिभागियों ने इनकी प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत को नजदीक से निहारा। रॉक गार्डन में अनुपयोगी चीजों से बनाई गई सुंदर कलाकृतियों को पास से देखकर लोग प्रफुल्लित हो उठे। साथ ही रॉक गार्डन के ओपन स्टेज पर चल रहे डीजे पर कुछ साथियों ने डांस भी किया।
रात के भोजन की व्यवस्था पंजाब यूनिर्वसिटी की मेस में की गई थी। वहां पर जाकर सभी ने भोजन किया। इस तरह सम्मेलन का दूसरा दिन भी बहुत सुखद रहा।
तीसरा दिन- अलविदा संकल्पों के साथ…
आज सम्मेलन का आखिरी दिन था। सभी प्रतिभागी देश के दूर-दूर के इलाकों से आए हुए थे। अपनी फ्लाइट, रेल या बस के अनुसार सभी को आज अलविदा कहना था।
सुबह 9 बजे जलपान शुरू हुआ। 10 बजे सभी लोग सम्मेलन हॉल  में आ गए। आयोजन समिति ने तीसा में सर्वश्रेष्ठ कार्य करने स्वयंसेवकों को स्मृति चिन्ह और प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया। सर्वश्रेष्ठ कार्य करने वाला स्वयं सहायता समूह था- मुम्बई। इसके अलावा सभी प्रतिभागियों को मंच पर बुलाकर सहभागिता प्रमाण पत्र वितरित किए गए।
मंच पर आकर लोगों ने इस सम्मेलन पर अपना फीडबैक दिया। सभी ने सम्मेलन के आयोजन की प्रशंसा करते हुए इसे एक अद्भुत सम्मेलन बताया। एक-एक करके लोगों के अलविदा कहने का सिलसिला जारी रहा। दोपहर 2 बजे लंच की व्यवस्था की गई। सभी ने लंच लिया। इसके बाद लोग अपने-अपने गंतव्य के लिए रवाना हुए।
इस यादगार सम्मेलन ने चण्डीगढ़ में एक नए इतिहास का सृजन किया। अब चण्डीगढ़ के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया है तीसा ने।
सम्मेलन में शामिल होने पर सभी प्रतिभागियों को धन्यवाद, बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएं… अगले साल 2018 में तीसा के आठवें सम्मेलन में आप सबका इंतजार रहेगा… धन्यवाद।
– अमित 09300939758

October 4, 2017

My love for fluency

I hated it when i couldn't utter a word and on top of it there was always some one who completed my sentence.

I hated it when i couldn't order my favorite food as it was damn difficult to pronounce.

I hated it when the idea of getting a perfect response for my roll calls sends a shiver down my spine.

I hated, I hated it, I hated it..............

Just because I have made my list of things to hate,it doesn't mean I have lost my tendency to love.

I loved it when the priest performs his sermons in an interrupted fashion.

I loved it when my English teacher recites the words of Yeats, Wordsworth or Shakespeare without any hesitation.

I loved it when the news anchor announces the news without any penchant for fumble and clumsiness.

I loved it when my friends share their lame stories and crack their dull jokes with such ease and calmness.

In fact I was in love with fluency and I have made my ways to find you.

I stuffed my mouth with pebbles like Demosthenes to attain coherent speech which was stupid.

I altered my speed of speaking to gain free flow while to others it sounded like I was singing.

I read tirelessly pages of newspaper alone just to bring myself out of my comfort zone.

And finally we met.

At first it seemed like we had a perfect relationship which was devoid of any suffering or hardship.
I didn't know what was going on your mind.
May be I was not your kind.
Suddenly you left me without any prior notice.

I had this unflinching desire to be with you in any way possible.
If you were by my side we could have conquer this world.
Rather than spending days and nights in anxiety I could have become an extrovert.
And by your mere support I could have known for my eloquence.

More so ever it was hard to found you in viva, interviews or presentation.
These act of betrayals only ends up in frustration.
Sometimes you help me which feels like you actually care.
But your disloyalty makes our relationship a one sided affair.

After all these constant flip flops I have finally realized that we are not meant to be together.
Regardless without you also I'll be stronger than ever.

September 24, 2017

Around the world!

Heer are some interesting news items:
1. Story of an athlete who goes on to live his life despite bullying.. PWS can learn a thing or two from him:

2. NSA (like TISA) runs self help group in USA. This group will be supported by a university. A big FLY in the ointment is that this support group will be led by SLPs. You can easily imagine what is going to happen in such a group! God bless us!

3. This is the story of a pws who was detailed at airport and she complained in writing. Moral: Not just survive, but EDUCATE the world by taking that extra step - of complaining and sharing about the unfair treatment..


This is what she wrote earlier:

Keep learning and keep educating others..

September 11, 2017

एक ग़लतफ़हमी 

नमस्ते दोस्तों 
उम्मीद करता हूँ आप सभी खुश होंगे। बहुत दिनों से मैंने कुछ लिखा नहीं था और अंदर भारीपन महसूस कर रहा था। मेरे पिताजी का स्वर्गवास कुछ दिनों पहले 21.08.2017 को हो गया. ये बहुत ही दुखभरा समय था मेरे और मेरे परिवार के लिए। कुछ वर्षो पहले भी मेरे ताऊजी का स्वर्गवास हुआ था और मरणोपरांत संस्कारो में एक संस्कार गरुड़ पुराण का भी होता है।  अगर आप में से कोई नहीं जानता हो तो बता दू की गरुड़ पुराण एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमे भगवान विष्णु उनकी सवारी गरुड़ को मृत्य के बाद क्या क्या होता है उसकी विस्तृत जानकारी दे रहे है।  

जब मेरे ताऊजी का देहांत हुआ था तब मेरे उम्र तक़रीबन 15 साल थी और वो एक ऐसा समय था जब मैं दिन रात बस हकलाहट के बारे में ही सोचता रहता था। तो जब मेरे ताऊजी की मरणोपरांत गरुड़ पुराण पढ़ी जा रही थी तो मैंने उसमे सुना "जो लोग पिछले जन्म में बहुत झूठ बोलते है वो अगले जन्म में हकलाते हैं". ये बात मेरे दिलो - दिमाग में घर कर गयी और मैं अगले कई  वर्षो तक खुद में बोलता रहा जरूर मैंने पिछले जन्म में बहुत झूठ बोले होंगे इसलिए मै इस जन्म में हकला रहा हूँ।  

इस बार मेरे पिताजी के देहांत पर गरुड़ पुराण पढ़ी जा रही थी तो मै सोच रहा था वही वाक्य फिर दोहराया जायेगा और मै उसे सुनना चाहता था ताकि मैं समझ सकूँ आखिर ऐसा क्यों लिखा गया हैं ? मैं उसे सुनने की लालसा में सबसे आगे बैठता था।  मै बेसब्री से उस वाक्य का इंतज़ार कर रहा था. पहला दिन गुज़रा और वो वाक्य नहीं आया, फिर दूसरा, तीसरा, चौथा, पांचवा और इस तरह पुरे  बीत गए और गरुड़ पुराण पूरी पढ़ी गई लेकिन वो वाक्य नहीं आया।  मै सोचता रहा कि क्या गरुड़ पुराण बदल गयी है?

अब इससे मेरे दिमाग से एक और गलतफहमी निकल गई  कि पिछले जन्म से इस जन्म का हकलाहट को लेकर कोई वास्ता नहीं है।  लेकिन फिर ऐसा क्यू हुआ की उस नादान उम्र में मैंने ऐसा सोचा ?

इस सवाल की लिए सभी के अलग अलग मत हो सकते हैं.मुझे मेरे मत पता हैं और बाकि मै आप लोगों की लिए ये सवाल छोड़ता हूँ।  

आपका अपना 
रवि कांत शर्मा 

September 5, 2017

If you have one lac, you should check it out...

I have often been given that advice – on our FB page! As I was wondering about it- where does it come from? – I thought of two true incidents which have shaped my own views and our community called TISA.

In 1988, I went to small village in Kumaon to work as a GP – Taragtal (link). I lasted just about 6 month because of all kind of hardships! But people left a very favorable impression on me. One lady- lets call her Falguni Devi – left a lasting impression on my mind. On day one itself in the village, I went around looking for some milk for my daily tea. I was referred to a woman, who had her humble stone cottage, surrounded by terraced fields, on the edge of the lake.

Falguni Devi, kept working, while listening to me and promised that everyday milk will be delivered to my home. Then, having lived in cities, I asked her: OK, how much money? I can give you some advance now.. I recoiled as I heard her sharp words in reply; She looked up in my face briefly, a little irritated and impatient, as she said: Who ever sells her child or milk? (Koi poot aur doodh bhi bechta hai? – are you out of your mind?).

I returned home quietly – shocked and surprised. She supplied me the milk without fail during my stay in the village all those months. I too learned to live with the community and serve them and learn from them. I discovered that villages, where the soul of India still survives, had lots to teach me and the world.

Then, many years later, just a few days back, a friend from Australia asked me to buy some medicine for him and courier it to him. He thought it will be cheaper here. I made enquiries and I was told that Enzalutamide will cost about Rs 4.7 lakh for one month course (120 capsules) as it will have to be imported. The same price as in Australia. The total duration of the treatment is eight month. I was shocked.

Then, I made some more search and discovered that this very effective drug for prostate cancer was discovered recently by medical researchers in UCLA, America. An American biopharmaceutical company, Medivation, promptly took it over for marketing all over the globe (wiki). But Indian Patent Office refused them the patent in India – thus giving time to Indian researchers to launch it in a few months as a generic drug, costing a small fraction:

“On November 10, 2016, the Indian Patent Office denied the patent for Xtandi (Enzalutamide), the steeply-priced lifesaving anti-prostate cancer drug .. It was a bold move on the part of the regulatory body, but it has paved way for the marketing of generic versions of the drug in the Indian markets at a fraction of the price of the original drug…” (ncbi)

May be my friend will live till then- I hope and pray. But looking at these cases, I began to think: why do men respond to other’s needs so differently? May be no one is at fault. Everyone has just followed their own national ideals. America is a land of opportunity and enterprise. India is a land of Falguni Devi, for whom there are no strangers and milk should always be offered for free. So, whom should I follow, being born here? TISA as a community draws its ideals and strengths from our old ideals; Vipassna and many other cultural bodies in India are still doing the same – offering selfless service, as the highest act of being human.

Now, coming to, efficacy. If these paid programs- like McGuire, are successful in teaching management of stammering, so is, Vipassna, Brahmvidya, Theater, Classical singing, self-effort, learning languages, taking up sales job, running self help groups, Toast master.. and not to talk of host of self-proclaimed therapists in India, who do it for a fraction of the fee. In my long career as a researcher in this field, I have seen many people benefitting from a variety of approaches- yes, including even blowing conch shell! Who are we to question that?

Finally, to answer that naïve advice: “If you have…”: if I have one lac rupees, I would rather travel to west and learn something from Professor Loriente, a pws who, in my opinion has contributed MORE than all the paid programs put together. He has boldly stated that it is society and therapists who need to change their assumption and biases against speech and its diversity (ISAD paper).

Again, if I have Rs one lac, I will travel to west and meet the authors of "Did I stutter" (link) website, who go to the root of the problem: the unholy alliance between medical technology, healthcare industry and societal forces trying to “normalize” everyone, which is fueling and sustaining these programs. We need a quantum leap, a paradigm shift – not sticking of Band-Aids, however fancy. And from Indians, we expect better understanding of their own society and its ethos. Before they discount self-help and promote program costing one lac, on TISA FB page, they should take note of the fact that 56 percent of Indians, some 680 million, lack the means to meet their basic needs (link).

And this is a land where Falguni Devi even today refuses to sell milk.. She offers it for free.

September 4, 2017

Secret Superstar

I have been watching with some interest, a new pws who has been organizing Google hangout frequently with great energy. Couple of times, I I bobbed in and out of these hangouts. He was conducting these hangouts in a very organized way- giving everyone plenty of time, without turning it in a personal monologue. He was also practicing and teaching others some solid basic techniques for better communication. I decided to interview this “secret superstar” volunteer of TISA. He is Bhupendra from Ujjain. Here is his life story as told to me:
I am Bhupendra Singh Rathore - from Nagda, Ujjain (Madhya Pradesh). I am pursuing my B Tech. in Textile Technology from M.L.V. Textile and Engineering College, Bhilwara. Currently I am in Final year. We are five members in my family. My father and brother work for Aditya Birla group, in Grasim industries pvt. Ltd. while my mother is housewife. My sister got married in Jaipur. My hobbies are travelling, writing poems, listening music, playing badminton and table tennis.
I suffered a lot in my life due to Stammering as any so many PWS suffer; simply I never lived my life – it seems. I always thought what others will think about me if I stammer, and that one constant concern ruined my life for about 21 years ( I am 21). I can’t eat what I want to eat, nor can I travel to places I want to travel – all because of that one worry, one obsession.
Lowest moment in my life came when, my teacher called me to speak in front of 150 students on violence vs. non violence in our Engineering College. Not a single word came out of my mouth for about 15 minutes! Possessed by great fear and shame, I ran away from the stage and came to my room and cried for about 5 hrs and then phoned my father: “I don’t want to continue my studies; No way…” But my father anyhow encouraged me: “Don’t worry. Everything is going to be fine one day, my son.”
Then, my search for healing and wholeness, brought me in touch with TISA. I understood, that only self help group meetings and courage can help a stammer in the long run. I began taking risks daily to learn something new, do something new. Life began changing around- slowly but certainly.
Actually, I came in contact with Tisa in the 1st year of my college. But I left it at that time because I was too young to understand the concept of acceptance and self-help . But Fate wanted to give me one more chance – fortunately. After the incidence I mentioned above – when I felt very low and lonely, I travelled to Delhi and Ahmadabad, for a 2 month internship. I grabbed this opportunity and attended a self-help group meeting in Delhi, and met Dixit sir, Abhay sir and Vishal Gupta sir; One discussion on acceptance in that meeting, really forced me to think about my own attitude towards stammering. I felt that I needed to change how I looked at my stammering.
Then, another BIG thing happened: I met Vipul bhai in Ahmadabad, who counseled me whenever I felt low and confused. I attended 4 SHG meetings in Ahmadabad. I still was often struggling and felt lost; At one such low point in my life, Vipul bhai asked me to take “initiative of helping others”. I began reaching out to others, to promote self-help, in Rajasthan and Madhya Pradesh – on phone, on hangouts. My life and my thoughts began changing slowly. So much so, today I wonder why was I so down and miserable?
We have done 7 hangouts meetings till date. And we are having many activities like group discussion, storytelling, tongue twister, poem reciting, jokes sharing etc. We also conduct some events every week to connect more pws with us – to offer them a social life, faith in themselves and the idea that life can be lived happily, even WITH stammering. Naturally, when we get together on hangouts etc. we encourage people to work on their communication skills, with or without “techniques” and have fun, above all.
As I have observed some people have improved a lot from 1st hangouts to 7th hangouts meet, and when they share that their life has begun to change after joining hangouts – I find it a truly high moment for me.
Yes, I do face problems with network connections, like many Indians (!). Sometime I just go to my friend’s rooms to conduct hangouts as internet connectivity is better in his area. Otherwise everything is coming along fine and I feel confident doing hangouts and other activities for TISA as a volunteer.
Looking back at my life, I think the three things, which have helped me a lot in turning my life around is: attending Regular SHG meetings; Taking risks in life and Taking initiatives. I could have waited for a magical therapist or a miracle program, to change my life. Perhaps the wait would have gone on for years. Instead, I said, even if self-help is rubbish let me check it out. And it works! Taking initiatives always works. I will never surrender my initiative to anyone however wise or well meaning they may be.
My future plans are: I want to continue these hangouts every week, to bring in some more hosts, and to start an in-person SHG in Southern Rajasthan. Because, face to face interactions also have a big role. And if we don’t go to remote areas in Rajasthan, who will?

Editor: wasn’t that inspiring? Wow! Well done Bhupendra! You are inspirational! Here is his interveiw as a video: https://youtu.be/N1S3u30eLRY 

August 16, 2017

Acceptance with Family

    I have observed this pattern for a long period of time in my life. I am well-behaved with my friends and colleagues.. In the presence of my friends, I try to portray myself as a fighter, or at times as a victim of stammering, with whom they can sympathize. .. But I am a totally different person in front of my family.. 

     Suppose I have had a bad speech day.. I would have had many blocks and severe stammering during the day.. I carry the emotional baggage to my house.. Since my mood is off due to stammering, I behave in a rude manner with my family members. My family members are perplexed with my behavior.. So what can be done?

     It would be better to share with my family that I had severe stammering during the day . So I am feeling sad/bad/angry....By doing so, I would no longer be required to wear the mask of "Everything is ok" in front of my family.. I can be as I am feeling inside.. I can accept that its ok to share feelings about my speech with my family... If I make it a habit to share my true feelings with my family, then I won't be required to wear a mask in front of them.. And they too would be at ease in my presence

July 30, 2017

Round the world in 8 minutes

Here is a quick update:

Teaching others about stammering can be a powerful path to recovery- rather than being sent to therapy day after day, often against your wish, often just to pacify the world around you: A little child of eight - Nye, in England, tries this path.. Read more here. This can happen only with the help of school, family and therapists around you- They must change their view. And if they dont, who is stopping you to change your view, especially if you are an adult? Right? Strat with people around you. But learn a little bit about stammering first...

Can religious people stammer? Should they? Are they free to do so? When I was a child, I often wondered that if I took sannyas, people will surely call me "Hakla Swami" - and that would be such an anti-climax! Bu hu bu hu... But here is a Rabbi, who did not give up and he talks about his struggles! Please note that he spells God as G-d. This is just because as a participating Jew, he is not supposed to use the holiest word lightly, as in writing or talking to others. Here read on, what he has learned from his stammering.

Third story from America: An engineer who complained of discrimination due to stammering at work-place lost his right to sue, because he did not bring it to Human resource of the company. What does it mean? It only means that stammering does not give us unlimited rights to use law in our favor. We have to proceed through proper channel and use accepted protocols. Here it is.

Instead of being reactive, we can be proactive- by educating the management and colleagues about our stammering. Dont use stammering as a body armor. Instead use it as an opportunity to educate the world around you and make it a weeeee bit better. Hai naa?

July 23, 2017

Clarifiations about TISA

There have been a few  allegations against TISA, which are  doing the rounds in various PWS whatsapp groups:-

Allegation 1.) TISA is against phone call practice with fellow PWS friends.

Allegation 2.)TISA charges fees for national conference.

Allegation 3.)No stammerer has been cured by attending TISA National conference since last six years.

Clarification 1.) TISA journey starts with acceptance of our stammering,acknowledging it and then working on our communication skills.. There is no fixed plan suggested by TISA. To each his/her own path.. So there is no question of opposing phone call practice.

Clarification 2.) TISA charges no professional fees for any event. It is a not for profit organisation. The money collected from participants is spent for expenses on their fooding, lodging, venue charges and other miscellaneous expenses related to event organisation.

Clarification 3.) TISA has never claimed cure of stammering at any event, be it national conference or workshops. National conference is to meet fellow stammerers , to share our thoughts and ideas and learn from each-other.

         The strange part is that those who are circulating these false allegations are first-hand beneficiaries of TISA events!! 
             So friends, if we die stammering till the end of our lives, it would not  be something to be ashamed of. But if we adhere to falsehood and ungratefulness , then how can we face our own selves? Picking up random tit-bits from casual conversations and presenting them as unalterable rules of TISA is not the mark of a genuine human being .Are spreading rumours and lies not the mark of a spineless person?